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गुरुवार, 6 दिसंबर 2012

जानिए सोनिया गाँधी के बारे में

“आप सोनिया गाँधी को कितना जानते हैं” की पहली कडी़, अंग्रेजी में इसके मूल लेखक हैं एस.गुरुमूर्ति और यह लेख दिनांक १७ अप्रैल २००४ को “द न्यू इंडियन एक्सप्रेस” में – अनमास्किंग सोनिया गाँधी- शीर्षक से प्रकाशित हुआ था ।
भारत की खुफ़िया एजेंसी “रॉ”, जिसका गठन सन १९६८ में हुआ, ने विभिन्न देशों की गुप्तचर एजेंसियों जैसे अमेरिका की सीआईए, रूस की केजीबी, इसराईल की मोस्साद और फ़्रांस तथा जर्मनी में अपने पेशेगत संपर्क बढाये और एक नेटवर्क खडा़ किया । इन खुफ़िया एजेंसियों के अपने-अपने सूत्र थे और वे आतंकवाद, घुसपैठ और चीन के खतरे के बारे में सूचनायें आदान-प्रदान करने में सक्षम थीं । लेकिन “रॉ” ने इटली की खुफ़िया एजेंसियों से इस प्रकार का कोई सहयोग या गठजोड़ नहीं किया था, क्योंकि “रॉ” के वरिष्ठ जासूसों का मानना था कि इटालियन खुफ़िया एजेंसियाँ भरोसे के काबिल नहीं हैं और उनकी सूचनायें देने की क्षमता पर भी उन्हें संदेह था । सक्रिय राजनीति में राजीव गाँधी का प्रवेश हुआ १९८० में संजय की मौत के बाद । “रॉ” की नियमित “ब्रीफ़िंग” में राजीव गाँधी भी भाग लेने लगे थे (“ब्रीफ़िंग” कहते हैं उस संक्षिप्त बैठक को जिसमें रॉ या सीबीआई या पुलिस या कोई और सरकारी संस्था प्रधानमन्त्री या गृहमंत्री को अपनी रिपोर्ट देती है), जबकि राजीव गाँधी सरकार में किसी पद पर नहीं थे, तब वे सिर्फ़ काँग्रेस महासचिव थे । राजीव गाँधी चाहते थे कि अरुण नेहरू और अरुण सिंह भी रॉ की इन बैठकों में शामिल हों । रॉ के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों ने दबी जुबान में इस बात का विरोध किया था चूँकि राजीव गाँधी किसी अधिकृत पद पर नहीं थे, लेकिन इंदिरा गाँधी ने रॉ से उन्हें इसकी अनुमति देने को कह दिया था, फ़िर भी रॉ ने इंदिरा जी को स्पष्ट कर दिया था कि इन लोगों के नाम इस ब्रीफ़िंग के रिकॉर्ड में नहीं आएंगे । उन बैठकों के दौरान राजीव गाँधी सतत रॉ पर दबाव डालते रहते कि वे इटालियन खुफ़िया एजेंसियों से भी गठजोड़ करें, राजीव गाँधी ऐसा क्यों चाहते थे ? या क्या वे इतने अनुभवी थे कि उन्हें इटालियन एजेंसियों के महत्व का पता भी चल गया था ? ऐसा कुछ नहीं था, इसके पीछे एकमात्र कारण थी सोनिया गाँधी । राजीव गाँधी ने सोनिया से सन १९६८ में विवाह किया था, और हालांकि रॉ मानती थी कि इटली की एजेंसी से गठजोड़ सिवाय पैसे और समय की बर्बादी के अलावा कुछ नहीं है, राजीव लगातार दबाव बनाये रहे । अन्ततः दस वर्षों से भी अधिक समय के पश्चात रॉ ने इटली की खुफ़िया संस्था से गठजोड़ कर लिया । क्या आप जानते हैं कि रॉ और इटली के जासूसों की पहली आधिकारिक मीटिंग की व्यवस्था किसने की ? जी हाँ, सोनिया गाँधी ने । सीधी सी बात यह है कि वह इटली के जासूसों के निरन्तर सम्पर्क में थीं ।

महाभारत काल मे हुआ था परमाणु बम, मिसाइल का प्रयोग

काश हिन्दू विरोधी और तथाकथित धर्म
निरपेक्षता के घिनोने विकार से ग्रस्त
हमारे इतिहासकर शिक्षा मे यह ध्यान देते

कि विज्ञान मे हुए सर्व ‘मूल
आविष्कारों का जनक’ भारत देश है।
पिछले दिनों इस बात का खुलासा हुआ
कि मोहन जोदड़ों में कुछ ऐसे कंकाल मिले थे,
जिसमें रेडिएशन का असर था । महाभारत में
सौप्टिकपर्व अध्याय १३ से १५ तक
ब्रह्मास्त्र के परिणाम दिये गएहै । Great
Event of the 20th Century. How
they changed our lives ? इस
विश्वासाई पुस्तक में हिरोशिमा नामक
जापान के नगर पर एटम बम फेंकने के बाद
जो परिणाम हुए उसका वर्णन हैं
दोनों वर्णन मिलते झूलते हैं । यह देख हमें
विश्वास होता हैं कि 3 नवंबर ५५६१
ईसापूर्व छोड़ा हुआ ब्रह्मास्त्र atomic
weapon अर्थात परमाणु बम ही था ।
महाभारत युद्ध का आरंभ १६ नवंबर
५५६१ ईसा पूर्व हुआ और १८ दिन चलाने
के बाद २ नवंबर ५५६१ ईसा पूर्व
को समाप्त हुआ उसी रात दुर्योधन ने
अश्वथामा को सेनापति नियुक्त किया । ३
नवंबर ५५६१ ईसा पूर्व के दिन भीम ने
अश्वथामा को पकड़ने का प्रयत्न किया ।
तब अश्वथामा ने जो ब्रह्मास्त्र छोड़ा उस
अस्त्र के कारण जो अग्नि उत्पन्न हुई वह
प्रलंकारी था । वह अस्त्र प्रज्वलित हुआ
तब एक भयानक ज्वाला उत्पन्न हुई
जो तेजोमंडल को घिर जाने समर्थ थी ।
अंग्रेज़ भी मानने लगे है की वास्तव मे
महाभारत मे परमाणु बम का प्रयोग हुआ
था, जिस पर शोध कार्य चल रहे है । पुणे के
डॉक्टर व लेखक पद्माकर विष्णु वर्तक ने
तो 40 वर्ष पहले ही सिद्ध
किया था कि वह महाभारत के समय
जो ब्रह्मास्त्र इस्तेमाल
किया गया था वह परमाणु बम के समान
ही था।
परमाणु बम के जनक J. Robert
Oppenheimer ने परमाणु बम के पहले
परीक्षण के बाद एक साक्षात्कार में
कहा की परमाणु बम बनाने
की प्रेरणा उन्हें श्री मद्भागवत गीता से
मिली है।
यहाँ व्यास लिखते हैं कि “जहां ब्रहास्त्र
छोड़ा जाता है वहीं १२ व्रषों तक
पर्जन्यवृष्ठी नहीं हो पाती “।
३ नवंबर ५५६१ ईसा पूर्व के दिन
छोड़ा हुआ ब्रह्मास्त्र और ६ अगस्त १९४५
को फेंका गया एटम बम इन दोनों के
परिणामों के साम्य अब देखें । दो घटनाओ के
बीच ७५०६ वर्ष व्यतीत हो गए है
तो भी दोनों मे पूर्ण साम्य दिखता है ।
महाभारत में बताया है की अश्वत्थामा ने
ऐषिका के साथ ब्रह्माश्त्र छोड़ा था इस
‘ऐषिका’ शब्द में ‘इष’ अर्थात ज़ोर से
फेंकना यह धातु हैं । इससे अर्थ हो जाता है
कि ऐषिका एक साधन था जिससे अस्त्र
फेंका जाता था । जैसे आज मिसाइल होते हैं
जो परमाणु बम को ढ़ोने मे कारगर होते है ।
रॉकेट को भी ऐषिका कहा जा सकता है ।
।। जयतु संस्कृतम् । जयतु भारतम् ।।

रामायण के रचयिता ... महर्षि वाल्मीकि

महर्षि वाल्मीकि संस्कृत भाषा के
आदि कवि और हिन्दुओं के आदि काव्य
'रामायण' के रचयिता के रूप में प्रसिद्ध है।

महर्षि कश्यप और अदिति के नवम पुत्र
वरुण (आदित्य) से इनका जन्म हुआ।
इनकी माता चर्षणी और भाई भृगु थे।
वरुण का एक नाम प्रचेत भी है, इसलिये
इन्हें प्राचेतस् नाम से उल्लेखित
किया जाता है।
उपनिषद के विवरण के अनुसार ये भी अपने
भाई भृगु की भांति परम ज्ञानी थे। एक
बार ध्यान में बैठे हुए वरुण-पुत्र के शरीर
को दीमकों ने अपना ढूह (बाँबी) बनाकर
ढक लिया था। साधना पूरी करके जब ये
दीमक-ढूह से जिसे वाल्मीकि कहते हैं, बाहर
निकले तो लोग इन्हें वाल्मीकि कहने लगे।
तमसा नदी के तट पर व्याध द्वारा कोंच
पक्षी के जोड़े में से एक को मार डालने पर
वाल्मीकि के मुंह से व्याध के लिए शाप के
जो उद्गार निकले वे लौकिक छंद में एक
श्लोक के रूप में थे। इसी छंद में उन्होंने नारद
से सुनी राम की कथा के आधार पर रामायण
की रचना की। कुछ लोगों का अनुमान है
कि हो सकता है, महाभारत
की भांति रामायण भी समय-समय पर कई
व्यक्तियों ने लिखी हो और अतिम रूप
किसी एक ने दिया हो और वह
वाल्मीकि की शिष्य परंपरा का ही हो..!!
.
.
एक अन्य विवरण के अनुसार इनका नाम
अग्निशर्मा था और इन्हें हर बात उलटकर
कहने में रस आता था। इसलिए ऋषियों ने
डाकू जीवन में इन्हें 'मरा' शब्द का जाप
करने की राय दी। तेरह वर्ष तक मरा रटते-
रटते यही 'राम' हो गया। बिहार के
चंपारन ज़िले का भैंसा लोटन गांव
वाल्मीकि का आश्रम था जो अब
वाल्मीकि नगर कहलाता है..!!!

ॐ जय जगदीश हरे के रचियता... श्रद्धा राम जी

ओम जय जगदीश हरे............ ये आरती उत्तर भारत में वर्षों से करोड़ों हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को स्वर देती रही है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसके रचयिता पर ब्रितानी सरकार के खिलाफ प्रचार करने के आरोप भी लगेथे?
पंजाब के छोटे से शहर फिल्लौर के रहने वाले श्रद्धा राम फिल्लौरी ने इस आरती को शब्द दिए थे. 30 सितंबर को उनकी 175वीं वर्षगांठ है.
आरती में शामिल पंक्ति - 'श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा'


में श्रद्धा शब्द जहां धार्मिक श्रद्धा बढ़ाने को कहता है, वहीं ये संभवतः इसके रचयिता की तरफ भी इशारा करता है.
फिल्लौरी का हिंदी साहित्य में भी अहम योगदान रहा है. कुछ विद्वान 1888 में आए उनके उपन्यास 'भाग्यवती' को हिंदी का पहला उपन्यास मानते हैं.
फिल्लौरी के शहर और आसपास के अधिकतर लोग उनके नाम से परिचित हैं. शहर के बस अड्डे पर उनकी मूर्ति लगाई गई है. दरअसल यहां के लोगों में भी कुछ साल पहले ही उन्हें लेकर जागरुकता बढ़ी है.
श्रद्धा राम ट्रस्ट चलाने वाले अजय शर्मा कहते हैं, ''लगभग 20 साल तक ये मूर्ति नगर परिषद के दफ्तर में पड़ी रही. फिर साल 1995 में बेअंत सिंह सरकार ने इसे बाहर निकाला और इसे लगाया गया.''
वे बताते हैं, ''हर साल उनके जन्म दिवस पर यहां एक कार्यक्रम आयोजित किया जाता है जिसमें श्रद्धा राम को श्रद्धांजलि दी जाती है और उनके बारे में जानकारीसाझा की जाती है. इस बार 175वीं वर्षगांठ पर कार्यक्रम कुछ बड़ा आयोजन होगा.''
श्रद्धा राम फिल्लौरी का जन्म 1837 में एक ब्राह्मण परिवार मेंहुआ था. उनके शहर के लोग बताते हैंकि जब वे महाभारत की कथा सुनाते थे तो सुनने के लिए काफी लोग जुटा करते थे.
उनकी जयंती पर उनको शत शत नमन है,,,,,
साभार : - अजय शर्मा, श्रद्धा राम ट्रस्ट / BBC HINDI
उन पर 1865 में ब्रितानी हुकूमत के खिलाफ प्रचार करने के आरोप लगेऔर उन्हें शहर से निकाल दिया गया था.
उन्होंने कुछ समय तक शहर से बाहर जा कर काम किया और फिर वापस अपने घर आ गए. 43 वर्ष की उम्र में उनका देहांत हो गया.
यहां के लोग श्रद्धा राम को 'पंडित जी' कह कर याद करते हैं. वे बताते हैं कि श्रद्धा राम ने अपनेज़माने में भ्रूण हत्या जैसी सामाजिक बुराईयों के खिलाफ अभियान चलाया था.
शर्मा कहते हैं कि अब उनके बारे में जानकारी बढ़ने लगी है और कुछ लोग उन पर अध्ययन भी करना चाहते हैं

दलित अछूत और मुस्लिम भाई...कैसे हिन्दू हो तुम?

सनातन धर्म दुनिया का सबसे प्राचीन धर्म है और अनुयायियोँ के संख्या के आधार पर कभी सबसे बड़ा धर्म हुआ करता था लेकिन आज हम दुनिया मेँ चौथे नम्बर पर है क्योँ ?

पहले हमसे बौद्ध अलग हुये फिर जैन फिर सिख और आज परिस्थितियाँ ऐसी बनती जा रही हैँ कि दलित हिन्दुओँ से टूटते जा रहे है

वर्तमान मेँ हम हिन्दुऔँ और दलितोँ के ठेकेदारोँ की औछी राजनीति को दोष दे सकते हैँ या फिर कह सकते है कि हमारा धर्म उदारवादी है अन

ुयायियोँ को किसी बंधन मेँ नहीँ रखता

वक्त बदलाव चाहता है हमेँ अपने धर्म की कुरुतियोँ आडम्बरोँ को खत्म करना है

आज भी कई मन्दियोँ मेँ निम्न जाति के लोगोँ का प्रवेश वर्जित है
आज भी कई जगह उनसे मैला ढुलवाने का काम लिया जाता है बदले मेँ थोड़े से पैसे जिनसे उनके परिवार का खर्च तक नहीँ चलता
समाज के कई कार्योँ से उनको वंचित रखा जाता है गाँवोँ मेँ छुआछूत भी जारी है
और ऐसे ही लोगोँ को निशाने बनाते हैँ ईसाई मिशनरी जो थोड़े से पैसे देकर धर्मपरिवर्तन करवा लेते

जब एक ईसाई सनातन धर्म को अपनाता है तो हम फेसबुक पर महिने भर तक उसकी फोटो शेयर करते हैँ लेकिन जब निम्न जाति के लौगोँ की बस्तियाँ की बस्तियाँ हिन्दू धर्म त्यागती हैँ तो हम चुप रहते हैँ

हिन्दूत्व की पार्टी बीजेपी उच्च वर्ग के लोगोँ के लिये है उन्हेँ कौई मतलब नहीँ होता निम्न वर्ग के लोग क्योँ धर्मपरिवर्तन करते हैँ उन्हेँ शाईनिँग ईंडिया बनाना है भारत से कोई मतलब नही

एक बार मैँ एक दलित हिन्दु से हिन्दुओँ को एकजुट रहने की बात कर रहा था तो उसने मुझसे पूँछा
" क्या कभी कोइ हिन्दुत्ववादी नेता अम्बेडकर जयन्ती मनाता है ?"
मेरे पास जबाव होते हुये भी आगे बोलने की हिम्मत नहीँ बची

दलितोँ की ठेकेदार माया मैडम अगर पार्कोँ पर लगाया जाने वाला पैसा दलितोँ का आर्थिक सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ापन दूर करने पर लगाती तो वाकई दलितोँ का उत्थान होता और वे खुद प्रेरणा स्त्रोत बनते

हमारे देश मेँ दहेज के कारण ही हर जिले मेँ हर रोज कोई ना कोई आत्महत्या कर लेता है इसी कारण कन्या भ्रूण हत्या होती

फेसबुक पर Save girl child वाले पेज चलाने भी खुद को दहेज लेने से नहीँ रोक पाते
दहेज लेने वाले माँ बाप कभी ये नहीँ सोचते कि जब आप इतनी मंहगाई का रोज रोना रौते तो लड़की के माँ बात इतना सारा पैसा इकठ्ठा कैसे जुटायेँगे

सनातन धर्म तो जीवन शैली है इससे विमुख होने का कोई कारण ही नहीँ मिलेगा लोगोँ के पास अगर समाज मे कुछ बदलाव आ जाये तो
लोग कहते हैँ वर्ण व्यवस्था वेदोँ मेँ थी लेकिन वेदोँ की वर्ण व्यवस्था कर्म के आधार पर निर्धारित होती थी ना कि जन्म के आधार पर .......

उच्च वर्ण की एक लड़की ने दलित हिन्दु लड़के से शादी कर ली तो तमिलनाड़ु के धर्मपुरी जिले के दलितोँ के तीन गाँव आग के हवाले कर दिये गये

"द हिन्दू" के अनुसार सवर्ण जाति के करीब 2500 लोगोँ ने मिलकर दलितोँ के लगभग 250 घरोँ को जला दिया और लड़की के पिता को आत्महत्या के लिये उकसाया जिसके बाद लड़की के बाप ने आत्महत्या कर ली

हमने कई केस देखेँ है जिनमेँ हिन्दु लड़की मुस्लिम लड़के से शादी कर लेती है और वर्तमान मेँ तो लव जिहाद भी चलाया जा रहा जिसमेँ बाद मेँ एक दो बच्चे पैदा करके लड़कियोँ को छोड़ दिया जाता है इसके लिये मस्जिदोँ से पैसा भी मिलता है

लेकिन इतना उग्र हिन्दुत्व कभी नहीँ दिखा

मुस्लिमोँ को अपनी बेटी सौँप सकते हो लेकिन दलितोँ को नहीँ क्योँ

लोग सेकुलरिज्म का पाठ पढाते समय एक रटा रटाया डायलोग बोलते
हिन्दु मुस्लिम का खून लाल ही होता

फिर दलित का खून पीला कैसे हो जाता

आप गौमाँस खाने वाले मुस्लिमोँ के साथ एक प्लेट मेँ खा सकते हो लेकिन दलित हिन्दुओँ के साथ नहीँ

आप मुस्लिमोँ से तीन बार गले मिल सकते हो लेकिन दलित हिन्दुओँ से नहीँ

आप मुस्लिमोँ को मंदिर पर चढ़ा सकते हो लेकिन दलितोँ को नहीँ

आप मुस्लिमोँ को भाई बोल सकते हो लेकिन दलितोँ को नहीँ

सदियोँ से तुम्हारी सेवा की दलितोँ ने मैला ढोया और आज भी करते हैँ
और मुस्लिमोँ ने क्या दिया ईतिहास देख लो महिलाओँ की इज्जत लूटी जनेऊ तुड़वाये मंदिर तोड़े

जब भी हिन्दूओं के खिलाफ कोई दंगा होता है और तो अधिकतर स्थानों पर तलवारें हमारे दलित भाई ही सँभालते है
1989 मेँ कोटा (राजस्थान) दंगे,
जहाँ अनंत चतुर्दशी की झांकी के दौरान मुस्लिमों ने भगवान राम, लक्ष्मण और सीता माता बनने वालों को काट दिया गया था। और फिर जब दलितों ने
तलवारे उठाई तो सारे मुल्ले भाग लिए थे
ऐसे कई उदाहरण हमारे आस पास मौजूद होँगे

तुम्हेँ चुनना है कौन तुम्हारा भाई है ?

विमान के आविष्कारक- पण्डित शिवकर बापूजी तलपदे

राइट्स बंधु को हवाई जहाज के आविष्कार के लिए श्रेय दिया जाता है क्योंकि उन्होंने 17 दिसम्बर 1903 हवाई जहाज उड़ाने का प्रदर्शन किया था। किन्तु बहुत कम लोगों को इस बात की जानकारी है कि उससे लगभग 8 वर्ष पहले सन् 1895 में संस्कृत के प्रकाण्ड पण्डित शिवकर बापूजी तलपदे ने “मारुतसखा” या

“मारुतशक्ति” नामक विमान का सफलतापूर्वक निर्माण कर लिया था जो कि पू

र्णतः वैदिक तकनीकी पर आधारित था। पुणे केसरी नामक समाचारपत्र के अनुसार श्री तलपदे ने सन् 1895 में एक दिन (दुर्भाग्य से से सही दिनांक की जानकारी नहीं है) बंबई वर्तमान (मुंबई) के चौपाटी समुद्रतट में उपस्थित कई जिज्ञासु व्यक्तियों , जिनमें भारतीय अनेक न्यायविद्/ राष्ट्रवादी सर्वसाधारण जन के साथ ही महादेव गोविंद रानाडे और बड़ौदा के महाराज सायाजी
राव गायकवाड़ जैसे विशिष्टजन सम्मिलित थे, के समक्ष अपने द्वारा निर्मित “चालकविहीन” विमान “मारुतशक्ति” के उड़ान का प्रदर्शन किया था। वहाँ उपस्थित समस्त जन यह देखकर आश्चर्यचकित रह गए कि टेक ऑफ करने के बाद “मारुतशक्ति” आकाश में लगभग 1500 फुट की ऊँचाई पर चक्कर लगाने लगा था। कुछ देर आकाश में चक्कर लगाने के के पश्चात् वह विमान धरती पर गिर पड़ा था।
यहाँ पर यह बताना अनुचित नहीं होगा कि राइट बंधु ने जब पहली बार अपने हवाई जहाज को उड़ाया था तो वह आकाश में मात्र 120 फुट ऊँचाई तक ही जा पाया था जबकि श्री तलपदे का विमान 1500 फुट की ऊँचाई तक पहुँचा था। दुःख की बात तो यह है कि इस घटना के विषय में विश्व की समस्त प्रमुख वैज्ञानिको और
वैज्ञानिक संस्थाओं/संगठनों पूरी पूरी जानकारी होने के बावजूद भी आधुनिक हवाई जहाज के प्रथम निर्माण का श्रेय राईट बंधुओं को दिया जाना बदस्तूर जारी है और हमारे देश की सरकार ने कभी भी इस विषय में आवश्यक संशोधन करने/ करवाने के लिए कहीं आवाज नहीं उठाई (हम सदा सन्तोषी और आत्ममुग्ध लोग जो है!)।
कहा तो यह भी जाता है कि संस्कृत के प्रकाण्ड पण्डित एवं वैज्ञानिक तलपदे जी की यह सफलता भारत के तत्कालीन ब्रिटिश शासकों को फूटी आँख भी नहीं सुहाई थी और उन्होंने बड़ोदा के महाराज श्री गायकवाड़, जो कि श्री तलपदे के
प्रयोगों के लिए आर्थिक सहायता किया करते थे, पर दबाव डालकर श्री तलपदे के प्रयोगों को अवरोधित कर दिया था। महाराज गायकवाड़ की सहायता बन्द हो जाने पर अपने प्रयोगों को जारी रखने के लिए श्री तलपदे एक प्रकार से कर्ज में डूब गए। इसी बीच दुर्भाग्य से उनकी विदुषी पत्नी, जो कि उनके प्रयोगों में उनकी सहायक होने के साथ ही साथ उनकी प्रेरणा भी थीं, का देहावसान हो गया और अन्ततः सन् 1916 या 1917 में श्री तलपदे का भी स्वर्गवास हो गया। बताया जाता है कि श्री तलपदे के स्वर्गवास हो जाने के बाद उनके उत्तराधिकारियों ने कर्ज से मुक्ति प्राप्त करने के उद्देश्य से “मारुतशक्ति” के अवशेष को उसकी तकनीक सहित किसी विदेशी संस्थान को बेच दिया था।
श्री तलपदे का जन्म सन् 1864 में हुआ था। बाल्यकाल से ही उन्हें संस्कृत ग्रंथों, विशेषतः महर्षि भरद्वाज रचित “वैमानिक शास्त्र” (Aeronauti cal Science) में अत्यन्त रुचि
रही थी। वे संस्कृत के प्रकाण्ड पण्डित थे। पश्चिम के एक प्रख्यात भारतविद्
स्टीफन नैप (Stephen-K napp) श्री तलपदे के प्रयोगों को अत्यन्त महत्वपूर्ण मानते हैं। एक अन्य विद्वान श्री रत्नाकर महाजन ने श्री तलपदे के प्रयोगों पर आधारित एक पुस्तिका भी लिखी हैं।श्री तलपदे का संस्कृत अध्ययन अत्यन्त ही विस्तृत था और उनके विमान सम्बन्धित प्रयोगों के आधार निम्न ग्रंथ थेः
महर्षि भरद्वाज रचित् वृहत् वैमानिक शास्त्र
आचार्य नारायण मुन रचित विमानचन्द् रिका
महर्षि शौनिक रचित विमान यन्त्र
महर्षि गर्ग मुनि रचित यन्त्र कल्प
आचार्य वाचस्पति रचित विमान बिन्दु
महर्षि ढुण्डिराज रचित विमान ज्ञानार्क प्रकाशिका
हमारे प्राचीन ग्रंथ ज्ञान के अथाह सागर हैं किन्तु वे ग्रंथ अब लुप्तप्राय -से हो गए हैं। यदि कुछ ग रंथ कहीं उपलब्ध भी हैं तो उनका किसी प्रकार का उपयोग ही नहीं रह गया है क्योंकि हमारी दूषित शिक्षानीति हमें अपने स्वयं की भाषा एवं संस्कृति को हेय तथा पाश्चात्य भाषा एवं संस्कृति को श्रेष्ठ समझना ही सिखाती है।

महान कूटनीतिज्ञ एवं राजनीतिज्ञ....आचार्य चाणक्य

चाणक्य का जन्म ईसा पूर्व तीसरी या चौथी शताब्दी माना जाता है । वे एक महान कूटनीतिज्ञ एवं राजनीतिज्ञ थे। इन्होंने मौर्य साम्राज्य की स्थापना और चन्द्रगुप्त को सम्राट बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इनके पिता का नाम चणक था, इसी कारण उन्हें 'चाणक्य' कहा जाता है। वैसे उनका वास्तविक नाम 'विष्णुगुप्त' था। कुटिल कुल में पैदा होने के कारण वे 'कौटिल्य' भी कहलाये।

चाणक्य के जीवन से जुड़ी
हुई कई कहानियां

प्रचलित हैं। एक बार चाणक्य कहीं जा रहे थे। रास्ते में कुशा नाम की कंटीली झाड़ी पर उनका पैर पड़ गया, जिससे पैर में घाव हो गया। चाणक्य को कुशा पर बहुत क्रोध आया। उन्होंने वहीं संकल्प कर लिया कि जब तक कुशा को समूल नष्ट नहीं कर दूंगा तब तक चैन से नहीं बैठूँगा। वे उसी समय मट्ठा और कुदाली लेकर पहुंचे और कुशों को उखाड़-उखाड़ कर उनकी जड़ों में मट्ठा डालने लगे ताकि कुशा पुनः न उग आये। इस कहानी से पता चलता है कि चाणक्य कितने कठोर, दृढ संकल्प वाले और लगनशील व्यक्ति थे। जब वे किसी काम को करने का निश्चय कर लेते थे तब उसे पूरा किये बिना चैन से नहीं बैठते थे।

चाणक्य की शिक्षा-दीक्षा तक्षशिला में हुई। तक्षशिला उस समय का विश्व-प्रसिद्ध विश्विद्यालय था। देश विदेश के विभिन्न छात्र वहाँ शिक्षा प्राप्त करने आते थे। छात्रों को चरों वेद, धनुर्विद्या, हाथी और घोड़ों का सञ्चालन, अठारह कलाओं के साथ-साथ न्यायशास्त्र, चिकित्साशास्त्र, राजनीतिशास्त्र, सामाजिक कल्याण आदि के बारे में शिक्षा दी जाती थी। चाणक्य ने भी ऐसी ही उच्च शिक्षा प्राप्त की। फलतः बुद्धिमान चाणक्य का व्यक्तित्व तराशे हुए हीरे के समान चमक उठा। तक्षशिला में अपनी विद्वता और बुद्धिमत्ता का परचम फहराने के बाद वह वहीं राजनीतिशास्त्र के आचार्य बन गए। देश भर में उनकी विद्वत्ता की चर्चा होने लगी।

उस समय पाटलिपुत्र मगध राज्य की राजधानी थी और वहां घनानंद नाम का राजा राज्य करता था। मगध देश का सबसे बड़ा राज्य था और घनानंद उसका शक्तिशाली राजा। लेकिन घनानंद अत्यंत लोभी और भोगी-विलासी था। प्रजा उससे संतुष्ट नहीं थी। चाणक्य एक बार राजा से मिलने के लिए पाटलिपुत्र आये। वे देशहित में घनानंद को प्रेरित करने आये थे ताकि वे छोटे-छोटे राज्यों में बंटे देश को आपसी वैर-भावना भूलकर एकसूत्र में पिरो सकें। लेकिन घनानंद ने चाणक्य का प्रस्ताव ठुकरा दिया और उन्हें अपमानित करके दरबार से निकाल दिया। इससे चाणक्य के स्वाभिमान को गहरी चोट लगी और वे बहुत क्रोधित हुए। अपने स्वभाव के अनुकूल उन्होंने चोटी खोलकर दृढ संकल्प किया कि जब तक वह घनानंद को अपदस्थ करके उसका समूल विनाश न कर देंगे तब तक चोटी में गांठ नहीं लगायेंगे। जब घनानंद को इस संकल्प की बात पता चली तो उसने क्रोधित होकर चाणक्य को बंदी बनाने का आदेश दे दिया। लेकिन जब तक चाणक्य को बंदी बनाया जाता तब तक वे वहां से निकल चुके थे। महल से बाहर आते ही उन्होंने सन्यासी का वेश धारण किया और पाटलिपुत्र में ही छिपकर रहने लगे।

एक दिन चाणक्य की भेंट बालक चन्द्रगुप्त से हुई, जो उस समय अपने साथियों के साथ राजा और प्रजा का खेल खेल रहा था। राजा के रूप में चन्द्रगुप्त जिस कौशल से अपने संगी-साथियों की समस्या को सुलझा रहा था वह चाणक्य को भीतर तक प्रभावित कर गया। चाणक्य को चन्द्रगुप्त में भावी राजा की झलक दिखाई देने लगी। उन्होंने चन्द्रगुप्त के बारे में विस्तृत जानकारी हासिल की और उसे अपने साथ तक्षशिला ले गए। वहां चाणक्य ने चन्द्रगुप्त को वेद-शास्त्रों से लेकर युद्ध और राजनीति तक की शिक्षा दी। लगभग आठ साल तक अपने संरक्षण में चन्द्रगुप्त को शिक्षित करके चाणक्य ने उसे एक शूरवीर बना दिया । उन्हीं दिनों विश्व विजय पर निकले यूनानी सम्राट सिकंदर विभिन्न देशों पर विजय प्राप्त करता हुआ भारत की ओर बढ़ा चला आ रहा था। गांधार का राजा आंभी सिकंदर का साथ देकर अपने पुराने शत्रु राजा पुरू को सबक सिखाना चाहता था।

चाणक्य को आंभी की यह योजना पता चली तो वे आंभी को समझाने के लिए गए। आंभी से चाणक्य ने इस सन्दर्भ में विस्तार पूर्वक बातचीत की, उसे समझाना चाहा, विदेशी हमलावरों से देश की रक्षा करने के लिए उसे प्रेरित करना चाहा; किन्तु आंभी ने चाणक्य की एक भी बात नहीं मानी। वह सिकंदर का साथ देने के लिए कटिबद्ध रहा। कुछ ही दिनों बाद जब सिकंदर गांधार प्रदेश में प्रविष्ट हुआ तो आंभी ने उसका जोरदार स्वागत किया। आंभी ने उसके सम्मान में एक विशाल जनसभा का आयोजन किया, जिसमें गांधार के प्रतिष्ठित व्यक्तियों के साथ-साथ तक्षशिला के आचार्य और छात्र भी आमंत्रित किये गए थे। इस सभा में चाणक्य और उनके शिष्य चन्द्रगुप्त भी उपस्थित थे। सभा के दौरान सिकंदर के सम्मान में उसकी प्रशंसा के पुल बांधे गए। उसे महान बताते हुए देवताओं से उसकी तुलना की गयी सिकंदर ने अपने व्याख्यान में अप्रत्यक्षतः भारतीयों को धमकी-सी दी कि उनकी भलाई इसी में है कि वे उसकी सत्ता स्वीकार कर लें। चाणक्य ने सिकंदर की इस धमकी का खुलकर बड़ी ही संतुलित भाषा में विरोध किया। वे विदेशी हमलावरों से देश की रक्षा करना चाहते थे। चाणक्य के विचारों और नीतियों से सिकंदर प्रभावित अवश्य हुआ लेकिन विश्व विजय की लालसा के कारण वह युद्ध से विमुख नहीं होना चाहता था।

सभा विसर्जन के बाद चाणक्य ने चन्द्रगुप्त के सहयोग से तक्षशिला के पांच सौ छात्रों को संगठित किया और उन्हें लेकर राजा पुरु से भेंट की । चाणक्य को देशहित में पुरु का सहयोग मिलने में कोई कठिनाई नहीं हुई । जल्दी ही सिकंदर ने पुरु पर चढ़ाई कर दी। पुरु को चाणक्य और चन्द्रगुप्त का सहयोग प्राप्त था, इसलिए उसका मनोबल बढ़ा हुआ था । युद्ध में पुरु और उसकी सेना ने सिकंदर के छक्के छुड़ा दिए; लेकिन अचानक सेना के हाथी विचलित हो गए, जिससे पुरु की सेना में भगदड़ मच गई। सिकंदर ने उसका पूरा-पूरा लाभ उठाया और पुरु को बंदी बना लिया । बाद में उसने पुरु से संधि कर ली। यह देखकर चाणक्य ने चन्द्रगुप्त को साथ लेकर पुरु का साथ छोड़ने में ही भलाई समझी। इसके बाद चाणक्य अन्य राजाओं से मिले और उन्हें सिकंदर से युद्ध के लिए प्रेरित करते रहे । इसी बीच सिकंदर की सेना में फूट पड़ गयी। सैनिक लम्बे समय से अपने परिवारों से बिछुड़े हुए थे और युद्ध से ऊब चुके थे। इसलिए वे घर जाना चाहते थे । इधर बहरत में भी सिकंदर के विरुद्ध चाणक्य और चन्द्रगुप्त के नेतृत्व में विभिन्न राजागण सिर उठाने लगे थे । यह देखकर सिकंदर ने यूनान लौटने का फैसला कर लिया। कुछ ही दिनों में बीमारी से उसकी मौत हो गई।

अब चाणक्य के समक्ष घनानंद को अपदस्थ करके एक विशाल साम्राज्य की स्थापना करने का लक्ष्य था। इस बीच चन्द्रगुप्त ने देश-प्रेमी क्षत्रियों की एक सेना संगठित कर ली थी । अतः चाणक्य ने चन्द्रगुप्त को मगध पर आक्रमण करने को प्रेरित किया। अपनी कूट नीति के बल पर चाणक्य ने चन्द्रगुप्त को मगध पर विजय दिलवाई । इस युद्ध में राजा घनानंद की मौत हो गयी। चाणक्य ने चन्द्रगुप्त को मगध का सम्राट घोषित कर दिया। बड़े जोर शोर से उसका स्वागत हुआ। चन्द्रगुप्त अपने गुरु चाणक्य को महामंत्री बनाना चाहता था किन्तु चाणक्य ने यह पद स्वीकार नहीं किया । वह मगध के पूर्व महामंत्री 'राक्षस' को ही यह पद देना चाहते थे। किन्तु राक्षस पहले ही कहीं छिप गया था और अपने राजा घनानंद की मौत का बदला लेने का अवसर ढूँढ़ रहा था। चाणक्य यह बात जानते थे। उन्होंने राक्षस को खोजने के लिए गुप्तचर लगा दिए और एक कूटनीतिक चाल द्वारा राक्षस को बंदी बना लिया। चाणक्य ने राक्षस को कोई सजा नहीं दी, बल्कि चन्द्रगुप्त को सलाह दी कि वह उसके तमाम अपराध क्षमा करके उसे महामंत्री पद पर प्रतिष्ठित करे। चाणक्य खुद गंगा के तट पर एक आश्रम बनाकर रहने लगे। वहीं से वह राज्य की रीति-नीति का निर्धारण करते और चन्द्रगुप्त को यथायोग्य परामर्श देते रहते।

अपनी प्रखर कूटनीति के द्वारा आचार्य चाणक्य ने बिखरे हुए भारतीयों को राष्ट्रीयता के सूत्र में पिरोकर महान राष्ट्र की स्थापना की। किन्तु विशाल मौर्य साम्राज्य के संस्थापक होते हुए भी वे अत्यंत निर्लोभी थे। पाटलिपुत्र के महलों में न रहकर वे गंगातट पर बनी एक साधारण-सी कुटिया में रहते थे और गोबर के उपलों पर अपना भोजन स्वयं तैयार करते थे। चाणक्य द्वारा स्थापित मौर्य साम्राज्य कालांतर में एक महान साम्राज्य बना। चन्द्रगुप्त ने उनके मार्गदर्शन में लगभग चौबीस वर्ष राज्य किया और पश्चिम में गांधार से लेकर पूर्व में बंगाल और उत्तर में कश्मीर से लेकर दक्षिण में मैसूर तक एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की।

आचार्य चाणक्य द्वारा रचित 'अर्थशास्त्र' एवं 'नीतिशास्त्र' नामक ग्रंथों की गणना विश्व की महान कृतियों में की जाती है। चाणक्य नीति में वर्णित सूत्र का उपयोग आज भी राजनीति के मार्गदर्शक सिद्धांतों के रूप में किया जाता है।