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शनिवार, 8 दिसंबर 2012

अण्डे का सच और रहस्य जिसे पढ़ कर सारा भारत देश अंडा खाना छोड देगा

आजकल मुझे यह देख कर अत्यंत खेद और आश्चर्य होता है की अंडा शाकाहार का पर्याय बन चुका है...खैर मै ज्यादा भूमिका और प्रकथन में न जाता हुआ सीधे तथ्य पर आ रहा हूँ. मादा स्तनपाईयों (बन्दर बिल्ली गाय मनुष्य) में एक निश्चित समय के बाद अंडोत्सर्जन एक चक्र के रूप में होता है, उदारहरणतः मनुष्यों में यह महीने में एक बार...चार दिन तक होता है. ज
िसे माहवारी या मासिक धर्म कहते है...उन दिनों में स्त्रियों को पूजा पाठ,
चूल्हा रसोईघर आदि से दूर रखा जाता है...यहाँ तक की स्नान से पहले किसी को छूना भी वर्जित है कई परिवारों में...!
शास्त्रों में भी इन नियमों का वर्णन है. इसका वैज्ञानिक विश्लेषण करना चाहूँगा...मासिक स्राव के दौरान स्त्रियों में मादा हार्मोन(estrogen) की अत्यधिक मात्रा उत्सर्जित होती है और सारे शारीर से यह निकलता रहता है...इसकी पुष्टि के लिए एक छोटा सा प्रयोग करिये...एक गमले में फूल या कोई भी पौधा है तो उस पर रजस्वला स्त्री से दो चार दिन तक पानी से सिंचाई कराइये...वह पौधा सूख जाएगा...!

अब आते है मुर्गी के अण्डे की ओर...
१) पक्षियों (मुर्गियों) में भी अंडोत्सर्जन एक चक्र के रूप में होता है. अंतर केवल इतना है की वह तरल रूप में ना हो कर ठोस(अण्डे) के रूप में बाहर आता है.
२) सीधे तौर पर कहा जाए तो अंडा मुर्गी की माहवारी या मासिक धर्म है और मादा हार्मोन (estrogen) से भरपूर है और बहुत ही हानिकारक है.
३) ज्यादा पैसे कमाने के लिए आधुनिक तकनीक का प्रयोग कर आजकल मुर्गियों को भारत में निषेधित ड्रग ओक्सिटोसिन(oxytocin) का इंजेक्शन लगाया जाता है जिससे के मुर्गियाँ लगातार अनिषेचित(unfertilized)अण्डे देती है.
४) इन भ्रूणों (अन्डो) को खाने से पुरुषों में (estrogen) हार्मोन के बढ़ने के कारण कई रोग उत्पन्न हो रहे है. जैसे के वीर्य में शुक्राणुओ
की कमी (oligozoospermia,azoospermia), नपुंसकता और
स्तनों का उगना(gynacomastia), हार्मोन असंतुलन के कारण डिप्रेशन आदि....वहीँ स्त्रियों में अनियमित मासिक, बन्ध्यत्व(PCO poly cystic oveary), गर्भाशय कैंसर आदि रोग हो रहे है.
५) अन्डो में पोषक पदार्थो के लाभ से
ज्यादा इन रोगों से हांनी का पलड़ा ही भारी है.
६) अन्डो के अंदर का पीला भाग लगभग ७०% कोलेस्ट्रोल है जो की ह्रदय रोग (heart attack) का मुख्य कारण है.
7) पक्षियों की माहवारी (अन्डो) को खाना, धर्म और शास्त्रों के विरुद्ध,
अप्राकृतिक और अपवित्र और चंडाल कर्म है.
8) अन्डो में से चूजा ( मुर्गी-मुर्गा ) बहार आता है, एक निश्चित समय पर
.और चूजो में रक्त-मांस-हड्डी-मज्जा-वीर्य-रस आदि होता है. चाहे उसे कही से भी काँटों. अन्डो में से घ्रणित द्रव्य निकलता है,जब
उसे तोड़ते हो, दोनों परिस्तिथियों में वह रक्त (जीवन) का प्रतिक है-मतलब
अंडा खाना मासांहार ही है...!
इसकी जगह पर आप दूध पीजिए जो के पोषक, पवित्र और शास्त्र सम्मत भी है

गुरुवार, 6 दिसंबर 2012

भाग जाना कायरता नहीं बल्कि एक मौका ढूंढने का अवसर भी भी है

लोग कहते हैं की बाबा रामदेव भाग गया....

पर भाई .. जब भगाओगे तो... भागना तो पड़ेगा ही ?

मर कर लड़ाई नहीं जीती जाती ..

ये गंधासुर की जो कहानियां हैं न, इसने पूरी पीढ़ी का सत्यानाश मार दिया....

अहिंसा.... अनशन...

भगत सिंह ने भी किया था सत्याग्रह .. लट्ठ खा कर सिद्धा हो गया था ... फिर बन्दूक ही उठाई l

अब आता हूँ मुद्दे पर....

1. भगवान् श्री कृष्ण भागे थे.... मथुरा से... द्वारिका गए..
नाम पडा रणछोड़...
परन्तु नाम की चिंता नहीं की उन्होंने...
क्योंकि वो जानते थे की वो किस कार्य के लिए धरती पर आये हैं... और जरासंध के साथ होने वाले युद्धों में समय नष्ट होगा और जान माल की हानि अलग....

दलित अछूत और मुस्लिम भाई...कैसे हिन्दू हो तुम?

सनातन धर्म दुनिया का सबसे प्राचीन धर्म है और अनुयायियोँ के संख्या के आधार पर कभी सबसे बड़ा धर्म हुआ करता था लेकिन आज हम दुनिया मेँ चौथे नम्बर पर है क्योँ ?

पहले हमसे बौद्ध अलग हुये फिर जैन फिर सिख और आज परिस्थितियाँ ऐसी बनती जा रही हैँ कि दलित हिन्दुओँ से टूटते जा रहे है

वर्तमान मेँ हम हिन्दुऔँ और दलितोँ के ठेकेदारोँ की औछी राजनीति को दोष दे सकते हैँ या फिर कह सकते है कि हमारा धर्म उदारवादी है अन

ुयायियोँ को किसी बंधन मेँ नहीँ रखता

वक्त बदलाव चाहता है हमेँ अपने धर्म की कुरुतियोँ आडम्बरोँ को खत्म करना है

आज भी कई मन्दियोँ मेँ निम्न जाति के लोगोँ का प्रवेश वर्जित है
आज भी कई जगह उनसे मैला ढुलवाने का काम लिया जाता है बदले मेँ थोड़े से पैसे जिनसे उनके परिवार का खर्च तक नहीँ चलता
समाज के कई कार्योँ से उनको वंचित रखा जाता है गाँवोँ मेँ छुआछूत भी जारी है
और ऐसे ही लोगोँ को निशाने बनाते हैँ ईसाई मिशनरी जो थोड़े से पैसे देकर धर्मपरिवर्तन करवा लेते

जब एक ईसाई सनातन धर्म को अपनाता है तो हम फेसबुक पर महिने भर तक उसकी फोटो शेयर करते हैँ लेकिन जब निम्न जाति के लौगोँ की बस्तियाँ की बस्तियाँ हिन्दू धर्म त्यागती हैँ तो हम चुप रहते हैँ

हिन्दूत्व की पार्टी बीजेपी उच्च वर्ग के लोगोँ के लिये है उन्हेँ कौई मतलब नहीँ होता निम्न वर्ग के लोग क्योँ धर्मपरिवर्तन करते हैँ उन्हेँ शाईनिँग ईंडिया बनाना है भारत से कोई मतलब नही

एक बार मैँ एक दलित हिन्दु से हिन्दुओँ को एकजुट रहने की बात कर रहा था तो उसने मुझसे पूँछा
" क्या कभी कोइ हिन्दुत्ववादी नेता अम्बेडकर जयन्ती मनाता है ?"
मेरे पास जबाव होते हुये भी आगे बोलने की हिम्मत नहीँ बची

दलितोँ की ठेकेदार माया मैडम अगर पार्कोँ पर लगाया जाने वाला पैसा दलितोँ का आर्थिक सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ापन दूर करने पर लगाती तो वाकई दलितोँ का उत्थान होता और वे खुद प्रेरणा स्त्रोत बनते

हमारे देश मेँ दहेज के कारण ही हर जिले मेँ हर रोज कोई ना कोई आत्महत्या कर लेता है इसी कारण कन्या भ्रूण हत्या होती

फेसबुक पर Save girl child वाले पेज चलाने भी खुद को दहेज लेने से नहीँ रोक पाते
दहेज लेने वाले माँ बाप कभी ये नहीँ सोचते कि जब आप इतनी मंहगाई का रोज रोना रौते तो लड़की के माँ बात इतना सारा पैसा इकठ्ठा कैसे जुटायेँगे

सनातन धर्म तो जीवन शैली है इससे विमुख होने का कोई कारण ही नहीँ मिलेगा लोगोँ के पास अगर समाज मे कुछ बदलाव आ जाये तो
लोग कहते हैँ वर्ण व्यवस्था वेदोँ मेँ थी लेकिन वेदोँ की वर्ण व्यवस्था कर्म के आधार पर निर्धारित होती थी ना कि जन्म के आधार पर .......

उच्च वर्ण की एक लड़की ने दलित हिन्दु लड़के से शादी कर ली तो तमिलनाड़ु के धर्मपुरी जिले के दलितोँ के तीन गाँव आग के हवाले कर दिये गये

"द हिन्दू" के अनुसार सवर्ण जाति के करीब 2500 लोगोँ ने मिलकर दलितोँ के लगभग 250 घरोँ को जला दिया और लड़की के पिता को आत्महत्या के लिये उकसाया जिसके बाद लड़की के बाप ने आत्महत्या कर ली

हमने कई केस देखेँ है जिनमेँ हिन्दु लड़की मुस्लिम लड़के से शादी कर लेती है और वर्तमान मेँ तो लव जिहाद भी चलाया जा रहा जिसमेँ बाद मेँ एक दो बच्चे पैदा करके लड़कियोँ को छोड़ दिया जाता है इसके लिये मस्जिदोँ से पैसा भी मिलता है

लेकिन इतना उग्र हिन्दुत्व कभी नहीँ दिखा

मुस्लिमोँ को अपनी बेटी सौँप सकते हो लेकिन दलितोँ को नहीँ क्योँ

लोग सेकुलरिज्म का पाठ पढाते समय एक रटा रटाया डायलोग बोलते
हिन्दु मुस्लिम का खून लाल ही होता

फिर दलित का खून पीला कैसे हो जाता

आप गौमाँस खाने वाले मुस्लिमोँ के साथ एक प्लेट मेँ खा सकते हो लेकिन दलित हिन्दुओँ के साथ नहीँ

आप मुस्लिमोँ से तीन बार गले मिल सकते हो लेकिन दलित हिन्दुओँ से नहीँ

आप मुस्लिमोँ को मंदिर पर चढ़ा सकते हो लेकिन दलितोँ को नहीँ

आप मुस्लिमोँ को भाई बोल सकते हो लेकिन दलितोँ को नहीँ

सदियोँ से तुम्हारी सेवा की दलितोँ ने मैला ढोया और आज भी करते हैँ
और मुस्लिमोँ ने क्या दिया ईतिहास देख लो महिलाओँ की इज्जत लूटी जनेऊ तुड़वाये मंदिर तोड़े

जब भी हिन्दूओं के खिलाफ कोई दंगा होता है और तो अधिकतर स्थानों पर तलवारें हमारे दलित भाई ही सँभालते है
1989 मेँ कोटा (राजस्थान) दंगे,
जहाँ अनंत चतुर्दशी की झांकी के दौरान मुस्लिमों ने भगवान राम, लक्ष्मण और सीता माता बनने वालों को काट दिया गया था। और फिर जब दलितों ने
तलवारे उठाई तो सारे मुल्ले भाग लिए थे
ऐसे कई उदाहरण हमारे आस पास मौजूद होँगे

तुम्हेँ चुनना है कौन तुम्हारा भाई है ?

माँसाहार अर्थात शैतान का प्रसाद .... वैश्विक अशान्ति का घर

माँसाहार को यदि "शैतान का प्रसाद" या  "अशान्ति का घर" कहा जाये, तो शायद कुछ गलत नहीं होगा. डा. राजेन्द्र प्रसाद जी नें एक बार कहा था कि "अगर संसार में शान्ति कायम करनी है तो उसके लिए दुनिया से माँसाहार को समाप्त करना होगा. बिना माँसाहार पर अंकुश लगाये ये संसार सदैव अशान्ति का घर ही बना रहेगा".


डा. राजेन्द्र प्रसाद जी नें कितनी सही बात कही है. ये कहना बिल्कुल दुरुस्त है कि माँसाहार के चलते दुनिया में शान्ति कायम नहीं रह सकती. शाकाहारी नीति का अनुसरण करने से ही पृथ्वी पर शान्ति, प्रेम, और आनन्द को चिरकाल तक बनाये रखा जा सकता है, अन्यथा नहीं.
पश्चिमी विद्वान मोरिस सी. किघली का भी कुछ ऎसा ही मानना है. उनके शब्दों में कहा जाए, तो " यदि पृथ्वी पर स्वर्ग का साम्राज्य स्थापित करना है तो पहले कदम के रूप में माँस भोजन को सर्वथा वर्जनीय करना होगा, क्योंकि माँसाहार अहिँसक समाज की रचना में सबसे बडी बाधा है".

आज जहाँ शाकाहार की महत्ता को स्वीकार करते हुए माँसाहार के जनक पश्चिमी राष्ट्रों तक में शाकाहार को अंगीकार किया जाने लगा है, उसके पक्ष में आन्दोलन छेडे जा रहे हैं, जिसके लिए न जाने कितनी संस्थायें कार्यरत हैं. पर अफसोस! भगवान राम और कृष्ण के भक्त, शाकाहारी हनुमान जी के आराधक, भगवान महावीर के 'जितेन्द्रिय', महर्षि दयानन्द जी के अहिँसक आर्य समाजी और रामकृष्ण परमहँस के 'चित्त परिष्कार रेखे' देखने वाले इस देश भारत की पावन भूमी पर "पूर्णत: शुद्ध शाकाहारी होटलों" को खोजने तक की आवश्यकता आन पडी है. आज से सैकडों वर्ष पहले महान दार्शनिक सुकरात नें बिल्कुल ठीक ही कहा था, कि-----"इन्सान द्वारा जैसे ही अपनी आवश्यकताओं की सीमाओं का उल्लंघन किया जाता है, वो सबसे पहले माँस को पथ्य बनाता है.". लगता है जैसे सीमाओं का उल्लंघन कर मनुष्य 'विवेक' को नोटों की तिजोरी में बन्द कर, दूसरों के माँस के जरिये अपना माँस बढाने के चक्कर में लक्ष्यहीन हो, किसी अंजान दिशा में घूम रहा हो.......

आईये हम माँसाहार का परिहार करें-----"जीवो जीवस्य भोजनं" अर्थात जीव ही जीव का भोजन है जैसे फालतू के कपोलकल्पित विचार का परित्याग कर "मा हिँसात सर्व भूतानि" अर्थात किसी भी जीव के प्रति हिँसा न करें----इस विचार को अपनायें.

माँस एक प्रतीक है---क्रूरता का, क्योंकि हिँसा की वेदी पर ही तो निर्मित होता है माँस. माँस एक परिणाम है "हत्या" का, क्योंकि सिसकते प्राणियों के प्रति निर्मम होने से ही तो प्राप्त होता है--माँस. माँस एक पिंड है तोडे हुए श्वासों का, क्योंकि प्राण घोटकर ही तो प्राप्त किया जाता है--माँस. माँस एक प्रदर्शन है विचारहीन पतन का, क्योंकि जीवों के प्रति आदर( Reverence of Life) गँवाकर ही तो प्राप्त किया जाता है--माँस.
इसके विपरीत शाकाहार निर्ममता के विपरीत दयालुता, गन्दगी के विपरीत स्वच्छता, कुरूपता के विरोध में सौन्दर्य, कठोरता के विपरीत संवेदनशीलता, कष्ट देने के विपरीत क्षमादान, जीने का तर्क एवं मानसिक शान्ति का मूलाधार है. 

मांसाहार बीमारियों की जड़ हैं. इससे दिल के रोग, गोउट, कैंसर जैसे अनेको रोगों की वृद्धि देखी गयी हैं और एक मिथक यह हैं की मांसाहार खाने से ज्यादा ताकत मिलती हैं इसका प्रबल प्रमाण पहलवान सुशील कुमार हैं जो विश्व के नंबर एक पहलवान हैं और पूर्ण रूप से शाकाहारी हैं. आपसे ही पूछते हैं की क्या आप अपना मांस किसी को खाने देंगे. नहीं ना तो फिर आप कैसे किसी का मांस खा सकते हैं.


जो स्वयं अंधे हैं वे दूसरो को क्या रास्ता दीखायेंगे. हिन्दू जो पशु बलि में विश्वास रखते हैं खुद ही वेदों के विरुद्ध कार्य कर रहे हैं. पशु बलि देने से केवल और केवल पाप लगता हैं, भला किसी को मारकर आपको सुख कैसे मिल सकता हैं. जहाँ तक वेदों का सवाल हैं मध्यकाल में कुछ अज्ञानी लोगो ने हवन आदि में पशु बलि देना आरंभ कर दिया था और उसे वेद संगत दिखाने के लिए महीधर, सायण आदि ने वेदों के कर्म कांडी अर्थ कर दियें जिससे पशु बलि का विधान वेदों से सिद्ध किया जा सके. बाद में माक्स्मुलर , ग्रिफीथ आदि पाश्चात्य लोगो ने उसका अंग्रेजी में अनुवाद कर दिया जिससे पूरा विश्व यह समझे की वेदों में पशु बलि का विधान हैं. आधुनिक काल में ऋषि दयानंद ने जब देखा की वेदों के नाम पर किस प्रकार से घोर प्रपंच किया गया हैं तो उन्होंने वेदों का एक नया भाष्य किया जिससे फैलाई गयी भ्रांतियों को मिटाया जा सके. देखो वेदों में पशु आदि के बारे में कितनी सुंदर बात कहीं गयी हैं-

ऋगवेद ५/५१/१२ में अग्निहोत्र को अध्वर यानि जिसमे हिंसा की अनुमति नहीं हैं कहा गया हैं.
यजुर्वेद १२/३२ में किसी को भी मारने से मनाही हैं
यजुर्वेद १६/३ में हिंसा न करने को कहा गया हैं
अथर्ववेद १९/४८/५ में पशुओ की रक्षा करने को कहा गया हैं
अथर्ववेद ८/३/१६ में हिंसा करने वाले को मारने का आदेश हैं
ऋगवेद ८/१०१/१५ में हिंसा करने वाले को राज्य से निष्काषित करने का आदेश हैं

इस प्रकार चारो वेदों में अनेको प्रमाण हैं जिनसे यह सिद्ध होता हैं की वेदों में पशु बलि अथवा मांसाहार का कोई वर्णन नहीं हैं.

रामायण , महाभारत आदि पुस्तकों में उन्हीं लोगो ने मिलावट कर दी हैं जो हवन में पशु बलि एवं मांसाहार आदि मानते थे.
वेद स्मृति परंपरा से सुरक्षित हैं इसलिए वेदों में कोई मिलावट नहीं हो सकती उसमे से एक शब्द अथवा एक मात्रा तक को बदला नहीं जा सकता.
रामायण में सुंदर कांड स्कन्द ३६ श्लोक ४१ में स्पष्ट कहाँ गया हैं की श्री राम जी मांस नहीं लेते वे तो केवल फल अथवा चावल लेते हैं.
महाभारत अनुशासन पर्व ११५/४० में रांतिदेव को शाकाहारी बताया गाय हैं.
शांति पर्व २६२/४७ में गाय और बैल को मारने वाले को पापी कहाँ गाय हैं.इस प्रकार के अन्य प्रमाण भी मिलते हैं जिनसे यह भी सिद्ध होता हैं की रामायण एवं महाभारत में मांस खाने की अनुमति नहीं हैं और जो भी प्रमाण मिलते हैं वे सब मिलावट हैं.


और सबसे महत्वपूर्ण बात ....

आज प्रत्येक होटल, रेस्तरां, ढाबे आदि पर जो मांसाहार मिलता है वो इस्लाम के हलाल सिद्धांत के अनुसार काट कर परोसा जाता है... झटका नही ल हलाल यानी शैतान के नाम पर चढ़ाया गया प्रसाद ... क्या आप ये प्रसाद ग्रहण करना चाहेंगे ?
और यदि कर रहे हैं तो आप सीधे सीधे ... इस्लामी शैतान में आस्था प्रकट कर रहे हैं ...


अब ये आप को सोचना है कि क्या आप अब भी माँस जैसे इस जड युगीन अवशेष से अपनी क्षुधा एवं जिव्हा लोलुपता को शान्त करते रहना चाहेंगें....................
-साभार लवी भारद्वाज जी